मध्यप्रदेश! गढ़ा मण्डला की ऐतिहासिक धरती पर इस वर्ष विगत 1 अक्टूबर से 5 अक्टूबर 2025 तक पांच दिवसीय गोंडी भाषा मानकीकरण कार्यशाला का भव्य आयोजन किया गया। अखिल गोंडवाना महासभा (ऑल इंडिया) के सौजन्य से आयोजित इस ऐतिहासिक कार्यक्रम ने गोंडी समाज में नई चेतना का संचार किया। “युवा जोश – युवा सोच” के मंत्र के साथ आयोजित यह आयोजन गोंडवाना गोटूल के अंतर्गत भाषा और संस्कृति के पुनर्जागरण का प्रतीक बन गया। कार्यक्रम का उद्देश्य केवल गोंडी भाषा का मानकीकरण नहीं बल्कि गोंडवाना की पहचान, गौरव और सांस्कृतिक धरोहर को पुनर्जीवित करना भी रहा।
राष्ट्रीय स्तर पर गूंजा गोंडी गौरव
इस पांच दिवसीय आयोजन में देश के छह राज्यों मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश और ओडिशा से आए प्रतिनिधियों, शिक्षकों, शोधकर्ताओं और युवा भाषाविदों ने भाग लिया। प्रतिभागियों ने अपनी मातृभाषा गोंडी के संरक्षण और विकास के प्रति गहरा समर्पण दिखाया। कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों से आए प्रतिभागियों ने गोंडी भाषा के विविध रूपों, लिपियों और ध्वन्यात्मक संरचना पर चर्चा की। यह कार्यशाला केवल भाषाई विमर्श तक सीमित नहीं रही बल्कि इसमें सांस्कृतिक परंपराओं, सामाजिक एकता और समुदाय की ऐतिहासिक पहचान पर भी विस्तार से विचार हुआ।

मुख्य अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति ने बढ़ाई शोभा
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि रहे अखिल गोंडवाना महासभा भारत के राष्ट्रीय अध्यक्ष तिरूमाल बी.एल. कोर्राम, जिनकी उपस्थिति ने पूरे आयोजन को गौरवशाली बना दिया। उनके साथ मंच पर उपस्थित रहे कोयताड़ हीरासन उईके (महिला प्रकोष्ठ प्रमुख, अखिल गोंडवाना महासभा भारत), तिरूमाल सिद्धे सिंह टेकाम, तिरूमाल बी.एस. परतेती (गोंड समाज प्रदेश अध्यक्ष), कमलेश शाह टेकाम (गोंगपा प्रदेश अध्यक्ष), तोड़साम देवराव (गोंडी भाषा कोऑर्डिनेटर, तेलंगाना), तोड़साम भुजंगराव (नांदेड़, महाराष्ट्र), शामराव चुके (चंद्रपुर), तिरूमाल दरबू सिंह उइके (भूतपूर्व विधायक), तिरूमाल देव सिंह सय्याम (भूतपूर्व विधायक मण्डला), तिरूमाल विष्णुदेव पद्दा (कांकेर), तिरूमाल बुद्धम सय्याम (वरिष्ठ समाजसेवी, अभिनेता एवं विचारक, सरगुजा), गोंडी सूर लहरी प्रेम सिंह मरावी (डिंडौरी), तिरूमाल नेहरू माडिव (आंध्रप्रदेश), तिरूमाल रामा मड़कमे (मालकांगिरी), बाबनेराव (तेलंगाना) तथा डॉ. तुलसीराम वरकड़े जैसी कई विभूतियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति से कार्यक्रम को भव्य रूप दिया।
गोंडी भाषा के मानकीकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल
कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य गोंडी भाषा की विभिन्न बोलियों में समानता स्थापित कर एक मानक रूप तैयार करना था। गोंडी एक प्राचीन द्रविड़ भाषा है जिसके अनेक रूप देश के अलग-अलग हिस्सों में बोले जाते हैं। इन रूपों के एकीकरण से भाषा की पहचान और उपयोगिता दोनों में वृद्धि होगी। पांच दिनों तक विशेषज्ञों ने ध्वनि, व्याकरण, शब्दावली, और लिपि पर चर्चा की। गोंडी शब्दकोश के संकलन, लेखन शैली के एकीकरण और शिक्षण मॉड्यूल के विकास पर भी गहन विमर्श हुआ। यह पहल आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मजबूत भाषाई आधार तैयार करेगी जिससे शिक्षा, साहित्य और प्रशासनिक क्षेत्रों में गोंडी भाषा को अधिकाधिक स्थान मिल सकेगा।
गोंडवाना गोटूल बना एकता और ज्ञान का केंद्र
“गोंडवाना गोटूल” के बैनर तले आयोजित यह कार्यशाला केवल भाषा नहीं बल्कि समुदाय की आत्मा का उत्सव थी। गोटूल पारंपरिक रूप से गोंड समाज का शिक्षण और अनुशासन केंद्र रहा है, और इसी परंपरा को आधुनिक स्वरूप देते हुए यह कार्यशाला एक नए युग की शुरुआत के रूप में सामने आई। युवा प्रतिभागियों ने इसमें उत्साहपूर्वक भाग लेते हुए मातृभाषा के प्रति अपने विचार और अनुभव साझा किए। गोटूल के वातावरण में संवाद, संगीत, लोककला और शिक्षा का सुंदर संगम देखने को मिला।
युवा जोश और महिला नेतृत्व का रहा अनोखा संगम
इस कार्यशाला की विशेषता रही कि इसमें युवाओं के साथ-साथ महिलाओं की सक्रिय भागीदारी भी रही। रायताड़ वैशाली धुर्वे और उनकी टीम ने आयोजन को संरचना और समन्वय का मजबूत आधार दिया। उन्होंने बताया कि भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि पहचान का प्रतीक है और इसके संरक्षण के लिए शिक्षा व्यवस्था में गोंडी को स्थान देना जरूरी है। युवाओं ने यह संकल्प लिया कि वे अपनी मातृभाषा में संवाद करेंगे, लिखेंगे और बच्चों को भी इसे सिखाएंगे।
छह राज्यों की भागीदारी ने बढ़ाई गोंडी भाषा की आवाज
कार्यक्रम में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश और ओडिशा के प्रतिनिधियों की उपस्थिति ने गोंडी भाषा के भौगोलिक विस्तार को दर्शाया। सभी ने एक स्वर में यह कहा कि गोंडी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग को अब और तेज किया जाएगा। इस दौरान विभिन्न राज्यों की गोंडी बोलियों की तुलना और एकरूपता के प्रयासों पर भी चर्चा हुई।
इस सफल आयोजन के पीछे टीम की निष्ठा और परिश्रम
कार्यक्रम की सफलता में जीएसयू टीम, अखिल गोंडवाना महासभा भारत, गोंडवाना गोटूल और विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों का बड़ा योगदान रहा। आयोजन की रूपरेखा और संचालन में तिरूमाल सुद्धे सिंह टेकाम, रायताड़ वैशाली धुर्वे, कमलेश गोंड, कमलेश मरकाम, कौशिकी ऊईके, राम दुर्गेश पेंद्रो, ईतेश टेकाम, पूरन शाह भवेदी, ध्यान सिंह टेकाम, रविंद्र शाह मराबी, गोपालदास मराबी और सुरेंद्र सिंह परते जैसे अनेक समाजसेवियों ने सक्रिय भूमिका निभाई। मण्डला, डिंडौरी, बालाघाट और सिवनी जिलों के कार्यकर्ताओं का अथक सहयोग इस आयोजन की सफलता का मूल आधार रहा।
बुद्धम सय्याम ने दिया गोंडी भाषा और अस्मिता का प्रेरक संदेश
कार्यशाला के समापन अवसर पर वरिष्ठ समाजसेवी, अभिनेता और विचारक बुद्धम सय्याम ने कहा कि गोंडी भाषा का मानकीकरण केवल भाषाई प्रयास नहीं बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण की प्रक्रिया है। उन्होंने कहा कि गोंडी बोले बिना गोंडवाना की आत्मा अधूरी है। “हमारी भाषा हमारी पहचान है। गोंडी बोले, गोंडी जिए और गोंडी सिखाए यही हमारी अस्मिता का सम्मान है।” उनके इस प्रेरक संदेश ने पूरे सभागार में गर्व और संकल्प की भावना जगा दी।
भाषा से संस्कृति तक का नवजागरण की शुरुआत
गढ़ा मण्डला की यह कार्यशाला गोंडी भाषा को नयी पहचान और दिशा देने में मील का पत्थर साबित हुई। इस आयोजन से स्पष्ट हुआ कि जब समाज अपनी जड़ों को पहचानता है, तब उसकी संस्कृति और अस्मिता दोनों मजबूत होती हैं। गोंडी भाषा के माध्यम से अब गोंडवाना का इतिहास, साहित्य, संगीत और शिक्षा एक बार फिर नई ऊंचाइयों की ओर अग्रसर होगा।गोंडी भाषा मानकीकरण कार्यशाला ने यह संदेश दिया कि जब युवा सोच और परंपरागत ज्ञान का संगम होता है, तब कोई भी भाषा या संस्कृति विलुप्त नहीं हो सकती। गढ़ा मण्डला का यह आयोजन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा। गोंडी भाषा के संरक्षण की यह मुहिम अब पूरे देश में एक नवजागरण का रूप ले चुकी है और इसमें मण्डला की भूमिका सदैव स्वर्णाक्षरों में लिखी जाएगी ।

