कोरबा, छत्तीसगढ़। जिले के पोड़ी उपरोड़ा विकासखंड अंतर्गत ग्राम सरमा और तनेरा में प्रस्तावित स्टोन माइन (पत्थर खदान) परियोजना को लेकर विरोध की लहर तेज हो गई है। मूलनिवासी किसान संघ ने 14 फरवरी 2026 को आयोजित जनसुनवाई को “औपचारिकता मात्र” और “फर्जी प्रक्रिया” करार देते हुए इसे निरस्त करने तथा परियोजना को पर्यावरणीय स्वीकृति न देने की मांग उठाई है। संघ का कहना है कि प्रभावित किसानों और ग्राम सभाओं की आपत्तियों को समुचित रूप से दर्ज नहीं किया गया, जिससे पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं।
संघ के प्रदेश अध्यक्ष लाल बहादुर सिंह कोर्राम के नेतृत्व में पोड़ी उपरोड़ा एसडीएम के माध्यम से छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल को सौंपे गए ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि पेसा कानून 1996 के तहत आवश्यक ग्राम सभा की पूर्ण और स्वतंत्र सहमति नहीं ली गई। ज्ञापन में कहा गया है कि जनसुनवाई में स्थानीय मूलनिवासी किसानों की वास्तविक चिंताओं—खेती पर असर, धूल-ध्वनि प्रदूषण, भूजल स्तर में गिरावट और आजीविका संकट—को गंभीरता से नहीं सुना गया। संघ का दावा है कि प्रस्तावित खनन से उपजाऊ कृषि भूमि के बंजर होने का खतरा है और आसपास के जल स्रोत प्रदूषित हो सकते हैं, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक दुष्प्रभाव पड़ेंगे।
ईआईए (पर्यावरण प्रभाव आकलन) रिपोर्ट पर भी सवाल उठाए गए हैं। संघ का आरोप है कि रिपोर्ट में स्थानीय पारिस्थितिकी, वन एवं वन्यजीवों पर संभावित दुष्प्रभावों का समुचित आकलन नहीं किया गया। ज्ञापन में यह भी उल्लेख है कि यह इलाका हाथियों के आवागमन का पारंपरिक मार्ग रहा है; ऐसे में खनन गतिविधियों से मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ने की आशंका है। संघ ने वनाधिकार कानून 2006 और जनसुनवाई अधिसूचना 2006 के प्रावधानों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए कहा है कि व्यक्तिगत और सामुदायिक वनाधिकार दावों के पूर्ण निराकरण से पहले किसी भी प्रकार की गैर-वानिकी गतिविधि को अनुमति देना अवैध होगा।
मूलनिवासी किसान संघ ने प्रशासन की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए 15 दिनों के भीतर कथित फर्जी जनसुनवाई की जांच कर उसे निरस्त करने की मांग की है। चेतावनी दी गई है कि समयबद्ध कार्रवाई नहीं होने पर व्यापक आंदोलन छेड़ा जाएगा और आवश्यकता पड़ने पर उच्च न्यायालय में याचिका दायर की जाएगी। उधर, इस पूरे प्रकरण पर प्रशासन की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, जिससे क्षेत्र में अनिश्चितता और तनाव का माहौल बना हुआ है। सरमा–तनेरा का यह विवाद अब स्थानीय असहमति से आगे बढ़कर कानूनी और पर्यावरणीय अधिकारों की बड़ी बहस का रूप लेता दिखाई दे रहा है।

