Friday, April 10, 2026
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संभु नरका पंडुम : मूल व्यवस्था की समझ और वर्तमान दिग्भ्रम: लेखक धर्मपाल कोड़ापे

संभु नरका पंडुम विशेष के संदर्भ में वर्तमान समय में अनेक प्रकार की भ्रांतियाँ फैलाकर मूल व्यवस्था से समाज को दिग्भ्रमित करने का प्रयास निरंतर किया जा रहा है। दुखद स्थिति यह है कि इन भ्रमजालों के निर्माण में केवल बाहरी लोग ही नहीं, बल्कि हमारे अपने मूलवासी समाज के कुछ लोग भी अनजाने में सहभागी बनते जा रहे हैं। परिणामस्वरूप, “संभु – पांच खंड धरती के मालिक” जैसे मूल दार्शनिक विचारों को ही काल्पनिक सिद्ध करने की कोशिशें तेज हो गई हैं।

आज हम देखते हैं कि संभु नरका पंडुम के अवसर पर कुछ स्थानों में दूसरे सांस्कृतिक प्रभावों के अनुसार संभु की बारात निकाली जाती है, भस्म-तिलक, ताबीज तथा गांजा पीते हुए किसी अन्य परंपरा के प्रतीक को संभु के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, और समाज का एक बड़ा हिस्सा बिना तर्क किए उसे स्वीकार कर लेता है। जबकि यह समझना आवश्यक है कि मडमिंग अर्थात् विवाह व्यवस्था की स्थापना करने वाले संभु और इन बाहरी प्रतीकों में दिखाए जाने वाले संभु अलग हैं। हमारी परंपरा में संभु किसी सवारी-आधारित देवत्व या मूर्तिमान प्रदर्शन से अधिक एक व्यवस्था, सिद्धांत और सामाजिक संरचना के निर्माता के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

यदि किसी नयताम की पहचान उसके प्रतीकात्मक जीवों—कुत्ता और कछुआ—से होती है, तो यह स्पष्ट है कि पहचान और सवारी का संबंध अलग-अलग सांस्कृतिक अवधारणाएँ हैं। अतः यह समझना आवश्यक है कि हमारी परंपरा में प्रतीक का अर्थ उसके गुणों और संदेश से है, न कि बाहरी प्रदर्शन से। जब हम बिना तर्क किए अन्य संस्कृतियों के रूपों की नकल करते हैं, तब धीरे-धीरे हम अपने आराध्य इष्ट-पेन से दूर होते चले जाते हैं और उसी के साथ-साथ संभु द्वारा स्थापित सुरक्षा, समृद्धि और जनकल्याणकारी व्यवस्था की मूल भावना भी कमजोर होती जाती है।

हमारी मूल व्यवस्था प्रकृति-सेवा, निराकार चेतना और प्रतीकात्मक किंतु वैज्ञानिक सोच पर आधारित रही है। यदि बाद के समय में संभु को मूर्त रूप में दिखाया जाने लगा, तो यह विचार करना आवश्यक है कि उस मूर्तिकरण की प्रक्रिया किसने और किन परिस्थितियों में प्रारंभ की। यह प्रश्न स्वयं ही हमें ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परतों को समझने की दिशा में ले जाता है।

माघी पुन्नी के तेरह दिन बाद संभु नरका पंडुम मनाने की परंपरा भी किसी गहरे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक आधार से जुड़ी है। गोंडी विद्वान मोतीरावेन कंगाली ने अपने लेखन में संभु को विष दिए जाने और तेरह दिन बाद उनके चेतना प्राप्त करने की घटना का उल्लेख किया है, जो इस तिथि-परंपरा को एक ऐतिहासिक संदर्भ प्रदान करता है। यदि इस घटना को तार्किक दृष्टि से देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि यह केवल धार्मिक कथा नहीं, बल्कि किसी सामाजिक-राजनीतिक षड्यंत्र और उसके बाद पुनर्स्थापित व्यवस्था का प्रतीक भी हो सकता है। इसलिए आवश्यक है कि समाज इन तथ्यों का अध्ययन करे, उन पर विचार-विमर्श करे और तर्कपूर्ण समझ विकसित करे।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी परंपराओं को दूसरों की नकल करके नहीं, बल्कि उनके मूल अर्थ और उद्देश्य को समझकर मनाएँ। संभु नरका पंडुम केवल उत्सव नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की स्मृति है जिसने समाज को सुरक्षा, समृद्धि और सामूहिक जनकल्याण की दिशा दी। यदि हम इस तंत्र को भूलकर केवल बाहरी रूपों में उलझ जाएँगे, तो धीरे-धीरे हमारी मूल पहचान कमजोर होती जाएगी।

अतः सभी बुद्धिजीवियों और समाजबंधुओं से निवेदन है कि संभु को समझें, संभु तंत्र के सिद्धांतों को अपनाएँ, और अपने वैज्ञानिक तथा प्रकृति-आधारित जीवनदर्शन को मजबूत करें। अपने उत्सवों को तर्क, अध्ययन और परंपरागत ज्ञान के साथ मनाएँ, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भ्रम नहीं, बल्कि अपनी वास्तविक सांस्कृतिक धरोहर को पहचान सकें ।

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