Monday, February 9, 2026
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सार्वजनिक सड़कों पर धर्म के नाम पर अतिक्रमण नहीं चलेगा: सार्वजनिक सड़क पर बने मंदिर को हटाने का आदेश

तमिलनाडु। मद्रास उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक स्थान, सड़क या स्थानीय निकाय के स्वामित्व वाली भूमि पर किसी भी प्रकार का अतिक्रमण स्वीकार्य नहीं है, भले ही वह धार्मिक स्वरूप का ही क्यों न हो। न्यायालय ने कहा कि कानून की नजर में सड़क या गली का कोई धार्मिक चरित्र नहीं होता और ऐसे अतिक्रमणों को हटाना नगर निगम आयुक्त का वैधानिक दायित्व है।

न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायण ने ग्रेटर चेन्नई क्षेत्र में सार्वजनिक सड़क पर स्थापित माता वेलंकन्नी मंदिर को हटाने का निर्देश देते हुए कहा कि संरचना की प्रकृति चाहे धार्मिक हो या गैर-धार्मिक, यदि वह सार्वजनिक भूमि पर अवैध रूप से बनी है तो उसे हटाना अनिवार्य है। न्यायालय ने दो टूक शब्दों में कहा कि धार्मिक भावनाओं का हवाला देकर सार्वजनिक रास्तों पर बने अतिक्रमण को संरक्षित नहीं किया जा सकता। यह मामला ए. सारथ नामक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया, जिसमें उन्होंने ग्रेटर चेन्नई कॉर्पोरेशन से मांग की थी कि उनकी संपत्ति के सामने सार्वजनिक सड़क पर स्थापित धार्मिक संरचना को हटाया जाए। याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि उन्होंने वर्ष 2024 में यह संपत्ति खरीदी थी और मरम्मत कार्य के दौरान यह सामने आया कि मुख्य प्रवेश द्वार के पास एक पूजा स्थल स्थापित है, जिससे न केवल उनके घर का रास्ता बाधित हो रहा है बल्कि आम राहगीरों को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मंदिर में पास के एक मकान से अवैध रूप से बिजली की आपूर्ति की जा रही है।

मामले में एक निजी व्यक्ति ने हस्तक्षेप करते हुए दावा किया कि यह मंदिर वर्ष 1995 में स्थापित किया गया था और वर्षों से यह क्षेत्र के लोगों के लिए आस्था और भावनात्मक संबल का केंद्र रहा है। उसका कहना था कि अब तक मंदिर के खिलाफ कोई शिकायत दर्ज नहीं हुई है और इसे हटाने से धार्मिक भावनाएं आहत होंगी तथा सामाजिक सौहार्द पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। उसने यह भी आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता द्वारा चयनात्मक आपत्ति उठाई जा रही है, क्योंकि पास में मौजूद अन्य धार्मिक संरचनाओं पर उसने कोई आपत्ति नहीं की। साथ ही, उसने याचिकाकर्ता पर अपनी संपत्ति के अवैध उपयोग जैसे फूड कोर्ट, अवैध बार और विस्फोटक सामग्री बेचने जैसे गंभीर आरोप भी लगाए। अदालत ने सभी दस्तावेजों और रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद पाया कि संबंधित मंदिर सरकारी पोरंबोक भूमि के रूप में दर्ज सार्वजनिक सड़क के लगभग आठ वर्ग मीटर क्षेत्र पर स्थित है। न्यायालय ने यह भी स्मरण कराया कि सर्वोच्च न्यायालय पहले ही यह स्पष्ट कर चुका है कि सार्वजनिक सड़कों पर किसी भी प्रकार की धार्मिक संरचना का निर्माण या संरक्षण अनुमेय नहीं है और धार्मिक भावनाओं को ऐसे अतिक्रमण के समर्थन में आधार नहीं बनाया जा सकता।

न्यायालय ने स्थानीय निकाय अधिनियम की धारा 128 का हवाला देते हुए कहा कि सार्वजनिक स्थान से अतिक्रमण हटाना आयुक्त का कर्तव्य है और इस मामले में निगम के क्षेत्रीय उपायुक्त द्वारा विधिसम्मत नोटिस जारी किया जा चुका है। इन परिस्थितियों में न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता राहत का अधिकारी है और संबंधित अधिकारियों को अतिक्रमण हटाने की कार्यवाही आगे बढ़ाने का निर्देश दिया। हालांकि, याचिकाकर्ता की संपत्ति के कथित अवैध उपयोग से जुड़े आरोपों पर अदालत ने यह स्पष्ट किया कि निजी व्यक्ति कानून के तहत उचित मंच पर स्वतंत्र रूप से कार्यवाही शुरू कर सकता है।

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