Friday, January 9, 2026
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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: मेरिट के आगे कोई दीवार नहीं, ओपन कैटेगरी सबके लिए खुली

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण और मेरिट के संतुलन को लेकर एक ऐतिहासिक और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाते हुए राजस्थान हाई कोर्ट के निर्णय को पूरी तरह बरकरार रखा है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार बिना किसी छूट या रियायत के सामान्य श्रेणी की कट-ऑफ से अधिक अंक प्राप्त करता है, तो उसे ओपन कैटेगरी में ही माना जाएगा और उसे केवल उसकी आरक्षित श्रेणी तक सीमित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने ‘डबल बेनिफिट’ की दलील को सिरे से खारिज करते हुए योग्यता को सर्वोपरि बताया है।वहीं जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने राजस्थान हाई कोर्ट प्रशासन और उसके रजिस्ट्रार द्वारा दायर अपीलों को खारिज करते हुए 18 सितंबर 2023 के डिवीजन बेंच के फैसले की पुष्टि की। यह मामला अगस्त 2022 में राजस्थान हाई कोर्ट द्वारा शुरू की गई भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा था, जिसमें जूनियर ज्यूडिशियल असिस्टेंट और क्लर्क ग्रेड–II के कुल 2,756 पदों पर नियुक्ति की जानी थी। चयन प्रक्रिया में 300 अंकों की लिखित परीक्षा और 100 अंकों की कंप्यूटर आधारित टाइपिंग परीक्षा शामिल थी तथा नियमों के अनुसार प्रत्येक श्रेणी में रिक्त पदों के पांच गुना अभ्यर्थियों को टाइपिंग टेस्ट के लिए शॉर्टलिस्ट किया जाना था।

मई 2023 में परिणाम घोषित होने के बाद यह तथ्य सामने आया कि SC, OBC, MBC और EWS जैसी आरक्षित श्रेणियों की कट-ऑफ सामान्य श्रेणी से भी अधिक चली गई। इसके चलते कई ऐसे अभ्यर्थी, जिन्होंने सामान्य श्रेणी की कट-ऑफ से ज्यादा अंक हासिल किए थे, लेकिन अपनी आरक्षित श्रेणी की कट-ऑफ से कुछ कम अंक होने के कारण टाइपिंग टेस्ट से बाहर कर दिए गए। इससे आहत अभ्यर्थियों ने राजस्थान हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता के अधिकार के उल्लंघन का आरोप लगाया।

राजस्थान हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने माना कि श्रेणीवार शॉर्टलिस्टिंग की प्रक्रिया अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन जो आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार बिना किसी विशेष रियायत के सामान्य श्रेणी की कट-ऑफ पार करते हैं, उन्हें ओपन कैटेगरी में ही शामिल किया जाना चाहिए। हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि पहले केवल मेरिट के आधार पर ओपन कैटेगरी की सूची तैयार की जाए, उसके बाद आरक्षित श्रेणियों की सूचियां बनाई जाएं और जो उम्मीदवार पहले ही ओपन कैटेगरी में आ चुके हों, उन्हें आरक्षित सूची से बाहर रखा जाए। साथ ही गलत तरीके से बाहर किए गए अभ्यर्थियों को टाइपिंग टेस्ट में शामिल होने का अवसर देने का आदेश भी दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ताओं की इस दलील को भी सिरे से खारिज कर दिया कि ऐसा करने से आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को दोहरा लाभ मिलेगा। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि ओपन या जनरल कैटेगरी कोई आरक्षित कोटा नहीं है, बल्कि यह सभी उम्मीदवारों के लिए योग्यता के आधार पर खुली होती है। केवल आवेदन पत्र में किसी आरक्षित श्रेणी का उल्लेख कर देना, किसी अभ्यर्थी को स्वतः उसी श्रेणी के पद पर नियुक्ति का अधिकार नहीं देता। यदि कोई आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार बिना किसी छूट के सामान्य श्रेणी से बेहतर प्रदर्शन करता है, तो उसे ओपन कैटेगरी में प्रतिस्पर्धा करने से रोका नहीं जा सकता।

जस्टिस दीपांकर दत्ता द्वारा लिखे गए फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि भर्ती प्रक्रिया में एस्टॉपल का सिद्धांत पूरी तरह लागू नहीं होता, खासकर तब जब प्रक्रिया में स्पष्ट अवैधता हो। कोर्ट ने कहा कि उम्मीदवार यह कल्पना नहीं कर सकते थे कि सामान्य श्रेणी से बेहतर प्रदर्शन करने के बावजूद उन्हें ओपन कैटेगरी से बाहर कर दिया जाएगा, इसलिए उनकी चुनौती को एस्टॉपल के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ और आर.के. सभरवाल बनाम पंजाब राज्य जैसे ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए दोहराया कि उच्च मेरिट हासिल करने वाले आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को केवल उनकी जाति या श्रेणी के आधार पर समान अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि ‘ओपन’ शब्द का अर्थ ही खुला होना है और ऐसे पद किसी भी जाति, वर्ग या श्रेणी के लिए आरक्षित नहीं होते, बल्कि केवल योग्यता के आधार पर भरे जाते हैं।

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