Sunday, January 11, 2026
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जब शासन बना जनसेवा: सुशासन तिहार 2025 ने छत्तीसगढ़ में रचा लोकतंत्र का उत्सव: विशेष लेखः एम.एस. मरपच्ची

सुशासन की संकल्पना से जनउत्सव तकः लोकतांत्रिक भारत की वैचारिक नींव

*सुशासन से जनउत्सव तक: भारतीय लोकतंत्र की विश्वास, विकास और जवाबदेही की ऐतिहासिक यात्रा

अटल बिहारी वाजपेयी का सुशासन दर्शन: सत्ता की राजनीति से सेवा का संस्कार और राष्ट्रनिर्माण की अमर विरासत

एमसीबी, छत्तीसगढ़। भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक जीवंत लोकतांत्रिक चेतना है, जिसकी आत्मा जनकल्याण, न्याय और सुशासन में निहित है। लोकतंत्र की वास्तविक सफलता का मूल्यांकन केवल चुनावों की संख्या या प्रक्रिया से नहीं, बल्कि इस कसौटी पर होता है कि शासन व्यवस्था आम नागरिक के जीवन को कितना सहज, सुरक्षित और सम्मानजनक बनाती है। इसी विचार को साकार करने के उद्देश्य से प्रत्येक वर्ष 25 दिसंबर को देशभर में सुशासन दिवस (गुड गवर्नेंस डे) मनाया जाता है। यह दिवस केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति एक राष्ट्रीय संकल्प है। यह भारत रत्न, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर मनाया जाता है, एक ऐसे युगपुरुष, जिनका संपूर्ण जीवन सुशासन, मर्यादा और राष्ट्रहित का प्रतीक रहा।

अटल बिहारी वाजपेयीः सत्ता को सेवा में रूपांतरित करने वाला युगदृष्टा

अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति के उन विरल शिखर व्यक्तित्वों में थे, जिन्होंने सत्ता को सेवा का माध्यम बनाया। 25 दिसंबर 1924 को जन्मे अटल जी का व्यक्तित्व विचार, विवेक और विनम्रता का अनुपम संगम था। उनकी वाणी में कवि की संवेदना, चिंतक की गहराई और राष्ट्रपुरुष का अडिग संकल्प एक साथ झलकता था। उन्होंने राजनीति को कटुता से मुक्त कर संवाद और सहमति की संस्कृति को प्रतिष्ठित किया। प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने भारत को आत्मविश्वास दिया । इसके साथ ही पोखरण परमाणु परीक्षण ने देश की सामरिक संप्रभुता को वैश्विक मान्यता दिलाई, जबकि स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना ने आर्थिक विकास की धमनियों को सशक्त किया। ग्रामीण सड़कों, दूरसंचार विस्तार और आधारभूत संरचना के विकास ने गांव और शहर के बीच की दूरी को कम किया। अटल जी का सुशासन दर्शन स्पष्ट था, कि विकास का प्रकाश अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक पहुंचे।

सुशासन दिवसः स्मरण नहीं, संकल्प का उत्सव-जहाँ विचार व्यवस्था बनते हैं और परिणाम इतिहास रचते हैं

इसी महान विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए वर्ष 2014 में केंद्र सरकार द्वारा 25 दिसंबर को आधिकारिक रूप से सुशासन दिवस घोषित किया गया। इसका उद्देश्य प्रशासनिक सुधारों को गति देना, पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करना तथा नागरिकों को शासन प्रक्रिया का सक्रिय सहभागी बनाना है। यह दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि सरकार का वास्तविक मूल्यांकन घोषणाओं से नहीं, बल्कि धरातल पर दिखाई देने वाले परिणामों से होता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत में सुशासन की अवधारणा ने नए और व्यापक आयाम प्राप्त किए हैं। “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास” केवल एक नारा नहीं, बल्कि समावेशी और उत्तरदायी शासन का समग्र दर्शन है। डिजिटल इंडिया ने सरकारी सेवाओं को नागरिकों की उंगलियों तक पहुंचाया। जनधन योजना ने करोड़ों गरीब परिवारों को औपचारिक बैंकिंग से जोड़ा। उज्ज्वला योजना ने महिलाओं को धुएं से मुक्ति दिलाई। आयुष्मान भारत योजना ने स्वास्थ्य सुरक्षा का भरोसा दिया, तो प्रधानमंत्री आवास योजना ने पक्के घरों का सपना साकार किया। डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर ने पारदर्शिता सुनिश्चित करते हुए बिचौलियों को हटाकर लाभ सीधे लाभार्थियों तक पहुंचाया। इन पहलों ने सुशासन को नीति-पत्रों से निकालकर जनजीवन की वास्तविकता बना दिया।

सुशासन तिहार: प्रशासन, सहभागिता और विश्वास से सशक्त होता छत्तीसगढ़

जब राष्ट्रीय स्तर पर सुशासन की यह भावना राज्यों तक पहुंचती है, तो वह स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप और अधिक प्रभावी स्वरूप ग्रहण करती है। छत्तीसगढ़ में यही भावना “सुशासन तिहार” के रूप में साकार हुई। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार ने यह सिद्ध किया है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक संवेदनशीलता का समन्वय शासन को वास्तव में जनसेवा का माध्यम बना सकता है। सरलता, सच्चाई और जमीन से जुड़ाव उनकी कार्यशैली की पहचान है। इसी संकल्प के साथ वर्ष 2025 में प्रदेशभर में सुशासन तिहार का आयोजन 8 अप्रैल से 31 मई तक किया गया, जो मात्र एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि प्रशासनिक संस्कृति में सकारात्मक परिवर्तन का प्रतीक बन गया।

सुशासन तिहार 2025 का आयोजन तीन चरणों में किया गया। प्रथम चरण में ग्राम पंचायतों और नगरीय निकायों में समाधान पेटियों की स्थापना कर तथा ऑनलाइन माध्यम से आवेदन आमंत्रित किए गए, जिससे निर्भीक नागरिक संवाद को मंच मिला। द्वितीय चरण में प्राप्त आवेदनों का संबंधित विभागों द्वारा परीक्षण और निराकरण किया गया, जिसने प्रशासनिक जवाबदेही को सशक्त रूप दिया। तृतीय चरण में समाधान शिविरों के माध्यम से मौके पर ही समस्याओं का समाधान किया गया, जहां शासन स्वयं जनता के बीच उपस्थित दिखाई दिया था, यही सुशासन का वास्तविक स्वरूप है।

जिले में विश्वास, सहभागिता और लोकतांत्रिक विजय

छत्तीसगढ़ के उत्तरी अंचल का महत्वपूर्ण क्षेत्र मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (एमसीबी) जिला इस अभियान के दौरान जनसरोकारों की सशक्त मिसाल बनकर उभरा। समाधान शिविरों और ग्राम चौपालों में व्यापक जनभागीदारी देखने को मिली। वर्षों से लंबित पेंशन, आवास, राशन कार्ड, आयुष्मान कार्ड, किसान सम्मान निधि और छात्रवृत्ति जैसे प्रकरणों का एक ही मंच पर समाधान किया गया। स्वास्थ्य शिविरों में निःशुल्क जांच और दवाइयां उपलब्ध कराई गईं। शिक्षा, कृषि, राजस्व, खाद्य, समाज कल्याण, महिला एवं बाल विकास, श्रम तथा अनुसूचित जाति-जनजाति विकास विभागों ने समन्वित रूप से सेवाएं प्रदान कीं। इससे जनता में यह विश्वास और गहरा हुआ कि शासन केवल आदेश देने वाली संस्था नहीं, बल्कि उनके जीवन का सक्रिय सहभागी है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच बेहतर समन्वय का प्रत्यक्ष लाभ एमसीबी जिले सहित पूरे छत्तीसगढ़ को मिला है। जब केंद्र की योजनाएं राज्य और जिला प्रशासन के माध्यम से गांवों तक पहुंचती हैं, तभी उनका वास्तविक प्रभाव दिखाई देता है। यही सुशासन दिवस और सुशासन तिहार 2025 की संयुक्त सफलता है। अटल बिहारी वाजपेयी का सपना था कि एक ऐसा भारत, जहां शासन पारदर्शी हो, प्रशासन जवाबदेह हो और विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। आज यह सपना राष्ट्रीय स्तर पर तकनीक और नवाचार के माध्यम से तथा राज्य स्तर पर मानवीय संवाद और प्रत्यक्ष सहभागिता के जरिए साकार होता प्रतीत हो रहा है।

{लेखक/विचारक: महेन्द्र सिंह मरपच्ची}

अंततः, सुशासन दिवस और छत्तीसगढ़ का सुशासन तिहार 2025 लोकतंत्र के वे सुदृढ़ स्तंभ हैं, जो शासन और जनता के बीच विश्वास की मजबूत नींव रखते हैं। मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर से लेकर पूरे छत्तीसगढ़ और भारत तक, सुशासन की यह यात्रा केवल प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना की विजय है। यह सिद्ध करती है कि जब शासन संवेदनशील होता है, तब लोकतंत्र केवल एक व्यवस्था नहीं, बल्कि एक जीवंत जनउत्सव बन जाता है।

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