पेसा कानून दिवस पर विशेष लेख: भारतीय लोकतंत्र का अधूरा वादा और जनजातीय स्वशासन की पुकार: संविधान, पाँचवीं अनुसूची और ग्रामसभा की कागज़ से जमीन तक की अधूरी यात्रा
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले और पेसा कानून की संवैधानिक आत्मा: संसाधन-समृद्धि, खनन और जनजातीय विस्थापन का गहराता द्वंद्व
पैसा कानून दिवस केवल एक स्मृति-दिवस नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र के उस अधूरे वादे की याद दिलाने वाला अवसर है, जो संविधान ने कोयतुर समाज से किया था। यह कानून उस ऐतिहासिक संघर्ष की परिणति है जिसमें कोयतुर समाज ने सदियों से अपने जल, जंगल, जमीन और स्वशासन की रक्षा की है। भारत जैसे बहुजातीय और बहुसांस्कृतिक देश में कोयतुर समुदाय केवल एक जनसंख्या वर्ग नहीं बल्कि एक जीवंत सभ्यता है, जिसकी शासन व्यवस्था, सामुदायिक निर्णय प्रणाली और प्रकृति के साथ सहअस्तित्व की परंपरा आधुनिक राज्य व्यवस्था से कहीं अधिक लोकतांत्रिक रही है। औपनिवेशिक काल में जब ब्रिटिश शासन ने वनों, खनिजों और भूमि पर केंद्रीकृत नियंत्रण स्थापित किया, तब सबसे पहला और सबसे गहरा आघात जनजातीय समाज पर ही पड़ा। स्वतंत्रता के बाद भी यह ऐतिहासिक अन्याय पूरी तरह समाप्त नहीं हो सका, बल्कि नए विकास मॉडल के नाम पर कई बार और गहराया।
संविधान निर्माण और जनजातीय समाज की ऐतिहासिक समझ
संविधान निर्माण के समय डॉ. भीमराव अंबेडकर और संविधान सभा के सदस्यों ने इस सच्चाई को स्वीकार किया कि आदिवासी समाज को सामान्य प्रशासनिक ढांचे में समाहित करना न केवल व्यावहारिक रूप से गलत होगा बल्कि यह उनके अस्तित्व के लिए भी घातक सिद्ध हो सकता है। इसी समझ से पाँचवीं अनुसूची और छठी अनुसूची को संविधान में शामिल किया गया। पाँचवीं अनुसूची का उद्देश्य अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले जनजातीय समाज को प्रशासनिक संरक्षण देना था, जबकि छठी अनुसूची पूर्वोत्तर भारत में स्वायत्त परिषदों के माध्यम से स्वशासन की व्यवस्था करती है। किंतु समय के साथ यह स्पष्ट होता गया कि केवल संवैधानिक प्रावधान पर्याप्त नहीं हैं, क्योंकि जमीनी स्तर पर ग्रामसभा की भूमिका सीमित रह गई और वास्तविक निर्णय शक्ति नौकरशाही और राजनीतिक ढांचे में सिमटती चली गई।
पेसा कानून : ग्रामसभा को सर्वोच्च निर्णयकारी शक्ति
लेखक/विचारक: महेन्द्र सिंह मरपच्ची
इसी पृष्ठभूमि में 1996 में पंचायतों का विस्तार अनुसूचित क्षेत्रों में अधिनियम अस्तित्व में आया, जिसे सामान्यतः पेसा कानून कहा जाता है। यह कानून भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ था क्योंकि इसने ग्रामसभा को केवल परामर्शदात्री संस्था नहीं बल्कि सर्वोच्च निर्णयकारी निकाय के रूप में स्थापित किया। पेसा कानून का मूल दर्शन यह है कि विकास बाहर से थोपा गया मॉडल नहीं बल्कि समुदाय की सहमति से उपजा हुआ प्रक्रिया होनी चाहिए। यह कानून जनजातीय समाज को उनके पारंपरिक अधिकार लौटाने, सामुदायिक संसाधनों पर नियंत्रण देने और आधुनिक राज्य व्यवस्था के भीतर उनके स्वशासन को कानूनी मान्यता देने का प्रयास करता है। पैसा कानून दिवस का महत्व इसी में निहित है कि यह हमें आत्ममंथन का अवसर देता है। यह दिवस यह प्रश्न खड़ा करता है कि क्या ग्रामसभा वास्तव में सशक्त हुई है या वह अब भी केवल कागजी संस्था बनकर रह गई है। यह दिन यह भी याद दिलाता है कि जिन क्षेत्रों के लिए यह कानून बनाया गया था, वहीं इसका सबसे अधिक उल्लंघन क्यों देखने को मिलता है। खनन, उद्योग, वन प्रबंधन और भूमि अधिग्रहण जैसे निर्णय क्या वास्तव में ग्रामसभा की स्वतंत्र और सूचित सहमति से लिए जा रहे हैं या सहमति को केवल औपचारिकता में बदल दिया गया है।
संवैधानिक प्रावधान और पेसा कानून की कानूनी आत्मा
संवैधानिक दृष्टि से पेसा कानून भारतीय संविधान के भाग नौ और पाँचवीं अनुसूची से गहराई से जुड़ा हुआ है। अनुच्छेद 243 ग्रामसभा की परिभाषा देता है और उसे स्थानीय स्वशासन की आधारशिला मानता है। अनुच्छेद 243 एम अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायतों के लिए विशेष प्रावधानों की अनुमति देता है। अनुच्छेद 244 पाँचवीं अनुसूची के माध्यम से अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन की व्यवस्था करता है। पाँचवीं अनुसूची का पैरा चार राज्यपाल को यह अधिकार देता है कि वे अनुसूचित क्षेत्रों में लागू कानूनों में संशोधन कर सकें ताकि आदिवासी हितों की रक्षा हो सके। इसी संवैधानिक शक्ति के अंतर्गत पेसा कानून का निर्माण किया गया। अनुच्छेद 338 ए राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को यह जिम्मेदारी देता है कि वह जनजातीय समुदाय के संवैधानिक और कानूनी अधिकारों की निगरानी करे। इन सभी प्रावधानों का संयुक्त उद्देश्य आदिवासी समाज को राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक न्याय प्रदान करना है।पेसा कानून के प्रमुख प्रावधानों की संवैधानिक व्याख्या यह स्पष्ट करती है कि ग्रामसभा को खनिज संसाधनों के उपयोग, लघु वन उपज के स्वामित्व, भूमि अधिग्रहण से पूर्व परामर्श और सहमति, पुनर्वास और विस्थापन की स्वीकृति, सामाजिक विकास योजनाओं की निगरानी तथा परंपरागत विवाद निपटान प्रणाली पर निर्णायक अधिकार प्राप्त है। यह कानून संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित जीवन और गरिमा के अधिकार को भी मजबूत करता है क्योंकि बिना सहमति के विस्थापन सीधे तौर पर जीवन की गुणवत्ता और गरिमा पर आघात करता है।
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय और न्यायिक दृष्टि
पेसा कानून की संवैधानिक आत्मा को समझने में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। समता बनाम आंध्र प्रदेश राज्य का ऐतिहासिक फैसला भारतीय न्यायपालिका में आदिवासी अधिकारों का मील का पत्थर माना जाता है। इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुसूचित क्षेत्रों की भूमि गैर-आदिवासियों को हस्तांतरित नहीं की जा सकती और खनन जैसी गतिविधियों में आदिवासी हित सर्वोपरि होने चाहिए। न्यायालय ने यह भी कहा कि राज्य प्राकृतिक संसाधनों का स्वामी नहीं बल्कि ट्रस्टी है और उसे इन संसाधनों का उपयोग जनहित में करना चाहिए, विशेषकर उन समुदायों के हित में जो पीढ़ियों से उन पर निर्भर रहे हैं।
नियामगिरि प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने पेसा कानून और ग्रामसभा की शक्ति को वास्तविक अर्थों में स्थापित किया। ओडिशा में वेदांता समूह द्वारा प्रस्तावित बॉक्साइट खनन परियोजना के संदर्भ में न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि यह तय करने का अधिकार ग्रामसभा को है कि कोई परियोजना उनकी धार्मिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय आस्था का उल्लंघन करती है या नहीं। यह फैसला इस बात की स्पष्ट स्वीकृति थी कि विकास की परिभाषा केवल आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं हो सकती बल्कि उसमें सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आयाम भी शामिल होने चाहिए। उड़ीसा माइनिंग कॉर्पोरेशन बनाम पर्यावरण एवं वन मंत्रालय मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह दोहराया कि ग्रामसभा की सहमति केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं बल्कि स्वतंत्र और सूचित होनी चाहिए। न्यायालय ने यह भी कहा कि प्रशासन का दायित्व है कि वह यह सुनिश्चित करे कि ग्रामसभा के सदस्य प्रस्तावों को अपनी भाषा में समझें और बिना किसी दबाव के निर्णय लें। यह निर्णय पेसा कानून के दुरुपयोग पर एक महत्वपूर्ण न्यायिक चेतावनी के रूप में देखा जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने लाफार्ज मामले में भी यह सिद्धांत प्रतिपादित किया कि पर्यावरणीय स्वीकृति और विकास परियोजनाओं में स्थानीय समुदायों की भागीदारी अनिवार्य है। हालांकि यह मामला सीधे पेसा से संबंधित नहीं था, लेकिन इसमें प्रतिपादित सिद्धांत आदिवासी क्षेत्रों में विकास की न्यायिक समझ को स्पष्ट करते हैं। न्यायालय ने माना कि सतत विकास का अर्थ केवल आर्थिक वृद्धि नहीं बल्कि सामाजिक न्याय और पर्यावरणीय संतुलन भी है।
छत्तीसगढ़ : संसाधन-समृद्धि और पेसा का विरोधाभास
इन न्यायिक निर्णयों के बावजूद जमीनी सच्चाई यह है कि पेसा कानून का क्रियान्वयन आज भी गंभीर चुनौतियों से घिरा हुआ है। कई राज्यों में नियमों का अधूरा होना, प्रशासनिक उदासीनता और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण यह कानून अपनी पूरी क्षमता के साथ लागू नहीं हो पाया है। मध्य प्रदेश, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में ग्रामसभा की सहमति के बिना खनन परियोजनाएँ स्वीकृत होने के अनेक उदाहरण सामने आए हैं। कहीं फर्जी ग्रामसभा बैठकों का सहारा लिया गया तो कहीं सरपंच या कुछ चुनिंदा व्यक्तियों को पूरे समुदाय का प्रतिनिधि मान लिया गया।छत्तीसगढ़ इस संदर्भ में एक अत्यंत महत्वपूर्ण राज्य है क्योंकि यहाँ प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता और आदिवासी आबादी का घनत्व दोनों एक साथ विद्यमान हैं। बस्तर, सरगुजा, कोरिया, जशपुर, कांकेर, नारायणपुर, बीजापुर, सुकमा, दंतेवाड़ा, कोरबा और रायगढ़ जैसे जिले पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत आते हैं। यहाँ पेसा कानून केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं बल्कि आदिवासी अस्तित्व की रक्षा का आधार है। वहीं कोरबा जिले का कोयला क्षेत्र पेसा कानून के सबसे गंभीर उल्लंघनों का उदाहरण प्रस्तुत करता है। गेवर, कुसमुंडा और दीपका जैसी विशाल खदानों के विस्तार में ग्रामसभा की भूमिका औपचारिकता तक सीमित रही। विस्थापन, पर्यावरणीय क्षति और सामाजिक विघटन ने आदिवासी समाज को गहरे संकट में डाल दिया। रायगढ़ के तमनार और धरमजयगढ़ क्षेत्र में भी यही स्थिति देखने को मिली जहाँ भाषा, समय और प्रक्रिया के माध्यम से ग्रामसभा की सहमति को अर्थहीन बना दिया गया। इसके विपरीत मैनपाट क्षेत्र में बॉक्साइट खनन के विरुद्ध ग्रामसभा द्वारा किया गया संगठित विरोध पेसा कानून के सही उपयोग का प्रेरक उदाहरण है। यहाँ जनजातीय समाज ने यह सिद्ध किया कि जागरूकता और एकता के माध्यम से संविधान प्रदत्त अधिकारों की रक्षा की जा सकती है। रेत और गिट्टी खनन के मामलों में भी यह स्पष्ट होता है कि जब ग्रामसभा को दरकिनार किया जाता है तो पर्यावरणीय और सामाजिक संकट गहराते हैं।
लोकतंत्र, ग्रामसभा और भविष्य की दिशा
पेसा कानून के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रशासनिक मानसिकता है जो अब भी केंद्रीकृत नियंत्रण को प्राथमिकता देती है। दूसरी चुनौती जागरूकता की कमी है क्योंकि कई ग्रामसभाएँ अपने अधिकारों से अनभिज्ञ हैं। कॉर्पोरेट दबाव, राजनीतिक हस्तक्षेप और सुरक्षा के नाम पर अधिकारों का हनन इस कानून को कमजोर बनाता है। इसके बावजूद यह कानून भारतीय लोकतंत्र को जमीनी स्तर तक ले जाने की क्षमता रखता है क्योंकि यह प्रतिनिधि लोकतंत्र के साथ-साथ प्रत्यक्ष लोकतंत्र की अवधारणा को भी सशक्त करता है।
भविष्य की दिशा स्पष्ट है। पेसा कानून दिवस हमें यह संकल्प लेने का अवसर देता है कि इस कानून को केवल प्रतीकात्मक न रहने दिया जाए। इसके लिए नियमों का सख्त पालन, ग्रामसभा को वास्तविक शक्ति, न्यायिक निगरानी और व्यापक सामाजिक जागरूकता अनिवार्य है। जब जनजातीय समाज स्वयं अपने अधिकारों का प्रयोग करेगा और राज्य व्यवस्था उसे सहयोग देगी तभी पेसा कानून अपनी पूर्णता को प्राप्त कर सकेगा।उपसंहार के रूप में यह कहा जा सकता है कि पेसा कानून दिवस आदिवासी स्वशासन, संवैधानिक नैतिकता और लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण का जीवंत प्रतीक है। यह दिवस हमें यह याद दिलाता है कि विकास का सही अर्थ तभी है जब वह समुदाय की सहमति और भागीदारी से हो। भारतीय संविधान ने जो अधिकार जनजातीय समाज को दिए हैं, पेसा कानून उनका व्यवहारिक रूप है। अब यह समाज, प्रशासन और न्यायपालिका की साझा जिम्मेदारी है कि इस कानून को कागज से निकालकर जमीन पर उतारा जाए ताकि आदिवासी समाज सम्मान, स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता के साथ आगे बढ़ सके।
पेसा कानून : संविधान की आत्मा और लोकतंत्र की कसौटी
पैसा कानून दिवस के व्यापक संदर्भ में यह समझना आवश्यक है कि पेसा केवल एक प्रशासनिक कानून नहीं बल्कि भारतीय संविधान की आत्मा का विस्तार है। यह कानून उस ऐतिहासिक अन्याय का संवैधानिक उत्तर है जो औपनिवेशिक शासन से लेकर स्वतंत्र भारत के केंद्रीकृत विकास मॉडल तक जनजातीय समाज के साथ होता रहा। पेसा कानून का मूल दर्शन यह स्वीकार करता है कि जनजातीय समाज विकास का विरोधी नहीं है बल्कि वह ऐसे विकास का पक्षधर है जो उसकी संस्कृति, प्रकृति और सामुदायिक जीवन के साथ सामंजस्य में हो। यही कारण है कि पेसा कानून ग्रामसभा को केवल एक प्रशासनिक इकाई नहीं बल्कि लोकतंत्र की मूल इकाई के रूप में स्थापित करता है। सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर अपने निर्णयों में इस संवैधानिक दर्शन को स्पष्ट किया है। समता निर्णय में न्यायालय ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि अनुसूचित क्षेत्रों की भूमि और संसाधन जनजातीय समाज की सामूहिक विरासत हैं और राज्य या निजी पूंजी उनका मनमाना उपयोग नहीं कर सकते। न्यायालय ने राज्य को ट्रस्टी के रूप में देखा जो संसाधनों का संरक्षण जनजातीय समाज के हित में करने के लिए बाध्य है। यह दृष्टिकोण सीधे तौर पर पेसा कानून की आत्मा से मेल खाता है क्योंकि यह कानून भी राज्य को निर्णायक नहीं बल्कि सहायक भूमिका में रखता है।
नियामगिरि मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ग्रामसभा को निर्णायक अधिकार देकर यह स्पष्ट कर दिया कि संविधान के तहत सांस्कृतिक और धार्मिक अधिकार आर्थिक विकास से कमतर नहीं हैं। यह फैसला केवल एक खनन परियोजना पर रोक नहीं था बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र के उस मूल प्रश्न का उत्तर था कि विकास का अंतिम निर्णय कौन करेगा। न्यायालय ने यह जिम्मेदारी सीधे ग्रामसभा को सौंपकर यह स्थापित किया कि आदिवासी समाज अपने भविष्य का निर्णय स्वयं लेने में सक्षम है। यह निर्णय पेसा कानून के क्रियान्वयन की न्यायिक कसौटी बन गया। इसके बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि इन ऐतिहासिक फैसलों का प्रभाव सीमित ही रहा है। कई बार प्रशासनिक तंत्र ने इन निर्णयों की व्याख्या को अपने अनुकूल मोड़ लिया। ग्रामसभा की सहमति को कागजी प्रक्रिया बना दिया गया और वास्तविक संवाद के स्थान पर औपचारिकताएँ पूरी की गईं। यह स्थिति केवल कानून का उल्लंघन नहीं बल्कि संविधान के साथ नैतिक विश्वासघात भी है।
छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में यह विरोधाभास और भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यहाँ एक ओर पेसा कानून लागू है और दूसरी ओर खनन आधारित विकास मॉडल ने जनजातीय समाज को हाशिए पर धकेल दिया है। बस्तर में लौह अयस्क, कोरबा और रायगढ़ में कोयला, सरगुजा और मैनपाट में बॉक्साइट तथा नदियों में रेत खनन ने यह सिद्ध कर दिया है कि संसाधन-समृद्ध क्षेत्र ही पेसा कानून के सबसे बड़े उल्लंघन स्थल बन गए हैं। यह संयोग नहीं बल्कि एक संरचनात्मक समस्या है जहाँ आर्थिक हित लोकतांत्रिक अधिकारों पर हावी हो जाते हैं। रेत और गिट्टी खनन के संदर्भ में पेसा कानून का उल्लंघन अपेक्षाकृत कम चर्चा में रहता है लेकिन इसका प्रभाव अत्यंत गहरा है। नदियों के पारिस्थितिकी तंत्र का विनाश, भूजल स्तर में गिरावट और कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव आदिवासी जीवन को सीधे प्रभावित करते हैं। जब ग्रामसभा इन गतिविधियों पर आपत्ति करती है तो उसे विकास विरोधी या कानून व्यवस्था के लिए खतरा बताकर दबा दिया जाता है। यह स्थिति पेसा कानून को निष्प्रभावी बनाने की एक सुनियोजित प्रक्रिया को उजागर करती है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि पेसा कानून की विफलता का कारण केवल प्रशासन या राज्य नहीं है बल्कि कहीं न कहीं राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और सामाजिक जागरूकता का अभाव भी है। कई ग्रामसभाएँ आज भी अपने संवैधानिक अधिकारों से अनजान हैं। भाषा की बाधा, शिक्षा की कमी और सूचना तक सीमित पहुँच ने जनजातीय समाज को कमजोर किया है। यही कारण है कि पेसा कानून के वास्तविक क्रियान्वयन के लिए केवल कानूनी सुधार नहीं बल्कि सामाजिक चेतना का निर्माण भी आवश्यक है। पेसा कानून और लोकतंत्र के संबंध को समझना भी आवश्यक है। भारतीय लोकतंत्र अब तक मुख्यतः प्रतिनिधि लोकतंत्र पर आधारित रहा है जहाँ जनता अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन में भागीदारी करती है। पेसा कानून इस ढाँचे में प्रत्यक्ष लोकतंत्र का तत्व जोड़ता है जहाँ नागरिक स्वयं निर्णय प्रक्रिया में भाग लेते हैं। ग्रामसभा के माध्यम से यह कानून लोकतंत्र को सत्ता के केंद्र से निकालकर समुदाय तक पहुँचाता है। यह लोकतंत्र का सबसे शुद्ध और जीवंत रूप है।
भविष्य की दिशा स्पष्ट रूप से इस बात पर निर्भर करती है कि पेसा कानून को कैसे देखा जाता है। यदि इसे केवल एक कानूनी बाधा माना गया तो यह संघर्ष और असंतोष को जन्म देगा। यदि इसे विकास की साझेदारी के रूप में अपनाया गया तो यह स्थायी और समावेशी विकास का मार्ग प्रशस्त करेगा। इसके लिए आवश्यक है कि पेसा नियमों का पूर्ण और ईमानदार क्रियान्वयन हो, ग्रामसभा को वास्तविक वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार दिए जाएँ, न्यायपालिका सक्रिय निगरानी करे और नागरिक समाज जागरूकता के अभियान चलाए।
पैसा कानून दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं बल्कि एक नैतिक संहिता भी है। जनजातीय समाज के लिए पेसा कानून केवल अधिकारों का संग्रह नहीं बल्कि आत्मसम्मान, पहचान और स्वशासन का प्रतीक है। जब तक ग्रामसभा को वास्तविक शक्ति नहीं मिलेगी, तब तक लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण अधूरा रहेगा। और जब तक विकास समुदाय की सहमति से नहीं होगा, तब तक वह विकास नहीं बल्कि विस्थापन ही कहलाएगा। पेसा कानून दिवस का सार यही है कि भारत का लोकतंत्र तभी पूर्ण होगा जब उसके सबसे हाशिए पर खड़े नागरिक को निर्णय का अधिकार मिलेगा। जल, जंगल और जमीन पर अधिकार केवल आर्थिक प्रश्न नहीं बल्कि अस्तित्व और गरिमा का प्रश्न है। पेसा कानून भारतीय संविधान की उस प्रतिबद्धता का प्रमाण है कि यह देश अपने जनजातीय समाज को केवल लाभार्थी नहीं बल्कि भागीदार मानता है। अब समय आ गया है कि इस प्रतिबद्धता को व्यवहार में बदला जाए ताकि पेसा कानून केवल कानून न रहकर जीवंत लोकतांत्रिक परंपरा बन सके।