Monday, January 12, 2026
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विशेष संपादकीयः सोनाखान की मिट्टी का गौरव – शहीद वीर नारायण सिंह – छत्तीसगढ़ की शौर्य परंपरा के प्रथम दीपस्तंभ

शहीद वीर नारायण सिंहः छत्तीसगढ़ की आत्मगाथा, अन्याय के विरुद्ध उठी जनचेतना की लौ, प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अमर बलिदान की अतुलनीय गाथा

शहीद वीर नारायण सिंहः छत्तीसगढ़ की जनजातीय चेतना, संघर्षशील विरासत और स्वतंत्रता के प्रथम जननायक का विस्तृत जीवन-चरित

शहीद वीर नारायण सिंहः छत्तीसगढ़ के स्वाभिमान, जनस्वराज और जनजातीय प्रतिरोध का अमर इतिहास

         धरती का भाग्य तब लिखता है जब कोई माँ ऐसी संतान को जन्म देती है जो अन्याय से समझौता नहीं करती, जो सत्ता के अत्याचार के सामने झुकने के बजाय असहायों के लिए तलवार उठाती है। छत्तीसगढ़ की बलौदाबाजार की पावन भूमि को यह सौभाग्य वर्ष 1795 में मिला जब सोनाखान में जन्मे बिंझवार कोयतुर समुदाय के गौरव वीर नारायण सिंह ने अपने जीवन से सिद्ध किया कि सच्चा नेतृत्व शासन के आसन पर बैठने से नहीं, बल्कि पीड़ित मानवता के आँसू पोंछने से जन्म लेता है। आज भी सोनाखान की धूल, रायपुर के जयस्तंभ चौक की ईंटें और बिंझवार कोयतुर समुदाय का लोकगीत सब एक ही नाम पुकारते हैंरू छत्तीसगढ़ का पहला वीर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, गरीबों का मसीहा और ब्रिटिश साम्राज्यवाद का सर्वप्रथम घोर विरोधी थे शहीद वीर नारायण सिंह।बचपन में शिक्षा और पराक्रम की विरासत के साथ किया नेतृत्व का प्रारंभ

वीर नारायण सिंह का जन्म एक जमींदार परिवार में हुआ था, पिता रामसाय बिंझवार सोनाखान के जमींदार थे, परंतु वे केवल भूमि के शासक नहीं थे परन्तु संघर्ष और न्याय परंपरा के वाहक थे। 1818-19 के दौरान भोंसले राजाओं और अंग्रेजों के विरुद्ध पिता ने तलवार उठाई थी और यद्यपि कैप्टन मैक्सन ने उस विद्रोह को दबा दिया परंतु पराक्रम की अग्नि बुझी नहीं। वही अग्नि आगे चलकर बालक वीर नारायण सिंह के स्वभाव, नेतृत्व और क्रांतिकारी चेतना में ज्वलित हुई। बचपन से ही वे साहसी, न्यायप्रिय और जनहित के भाव में बढ़ते गए। शिक्षा ने उनके व्यक्तित्व में विवेक, नीति और दूरदर्शिता जोड़ी और ग्रामीण जनता के बीच वे कम उम्र में ही समाधानकर्ता और रक्षक के रूप में पहचाने जाने लगे। पिता की मृत्यु 1830 में हुई और उसी समय मात्र युवावस्था में वीर नारायण सिंह सोनाखान के जमींदार बने। लेकिन उनका दरबार महलों में नहीं गाँव के चौक – चौराहों से लेकर खेतों और गरीबों की झोपड़ियों में लगता था। वे राजा थे, परंतु जनसेवक पहले थे, यही उन्हें अलग बनाता था।

न्याय और जनसेवा का नई युग यह जमींदारी नहीं जन नेतृत्व था

सोनाखान में उन्होंने शासन से अधिक समाज का कार्य किया। गरीबों के विवाद सुलझाना, महिलाओं की सुरक्षा, किसानों की मदद, श्रमिकों की समस्या सुनना, यह सब उनका दैनिक कार्य था। जमींदारी की व्यवस्था में जहाँ शासक और प्रजा का रिश्ता ऊपर-नीचे का होता था, वहीं वीर नारायण सिंह ने उसे परिवार के रिश्ते में बदल दिया। इसीलिए वे जनता के नेता बने, ताज के नहीं बल्कि दिलों के राजा बने। बहुत कम समय में पूरे क्षेत्र के हृदय पर उनका अद्वितीय प्रभाव हो गया और अंग्रेज प्रशासन के लिए यह प्रभाव खतरे की घंटी बन चुका था।

वीर नारायण ने 1854 में ब्रिटिश शासन को कर विरोध के खिलाप दिया पहली और सीधी चुनौती

1854 में अंग्रेजों ने नए कर लागू किए, जिन्हें जनता अन्यायी और अमानवीय कहकर अस्वीकार कर रही थी। वीर नारायण सिंह ने खुलकर जनता के साथ खड़े हुए थे। उस समय रायपुर के उप-आयुक्त इलियट उनकी बढ़ती लोकप्रियता और जनसमर्थन से भयभीत हो चुका था और तभी से वह उन्हें अपमानित और दबाने के षड्यंत्र में जुट गया। परंतु वीर नारायण सिंह किसी भी कीमत पर अन्याय के सामने मौन रहने वाले नहीं थे। अंग्रेजी नीतियाँ जनता के शोषण का साधन थीं और वे सत्ता के सामने झुकने के बजाय सत्य और न्याय के साथ खड़े रहना अपना कर्तव्य मानते थे।

1856 का वह भयानक अकाल उस समय हुआ गरीबों के मसीहा का जन्म

1856 में छत्तीसगढ़ भयंकर अकाल से तड़प रहा था। खेत सूख गए, लोग भूख से मर रहे थे और उसी समय साहूकारों व व्यापरियों ने अनाज बंद कर रखा था ताकि ऊँचे दाम पर बेचकर फायदा कमाया जाए। शासन सब कुछ देख रहा था लेकिन मौन था। उसी समय कसडोल के व्यापारी माखनलाल के गोदाम में अन्न के पहाड़ जमा थे, परन्तु दरवाजे गरीबों के लिए बंद थे। वीर नारायण सिंह ने पहले विनम्रता से माखनलाल से कहा कि वह अनाज को गरीबों में बाँटे। लेकिन व्यापारी ने सत्ता के अहंकार में इनकार कर दिया। जनता तड़पती रही और माखनलाल कानून का सहारा लेकर गरीबों की भूख का मजाक उड़ाता रहा। तब आगे आए सोनाखान के जननायक वीर नारायण सिंह उन्होंने गोदाम के ताले तुड़वा दिए और पूरा अन्न को गरीबों में बाँट दिया। वह चोरी नहीं थी बल्कि वह मानवता की रक्षा थी, जीवन बचाने का धर्म था। परंतु अंग्रेजों की नजरों में उसे डकैती घोषित की गई और 24 अक्टूबर 1856 को उन्हें गिरफ्तार कर रायपुर जेल में बंद कर दिया गया। पर यही घटना उन्हें जनता के हृदय में गरीबों के मसीहा और छत्तीसगढ़ के रॉबिनहुड के रूप में अमर कर गई।

1857 का वह स्वतंत्रता संग्राम जब जनता ने पुकारा “हमें नेता चाहिए, हमें नारायण सिंह चाहिए”

1857 में देश में स्वतंत्रता का ज्वालामुखी फूट पड़ा और उत्तर भारत से क्रांति की लहर रोटी और कमल के प्रतीक के माध्यम से संचारित होती हुई छत्तीसगढ़ पहुँची। जनता ने पुकारा “हमें नेता चाहिए, हमें नारायण सिंह चाहिए” सैनिक, जेल प्रहरी, आम नागरिक सब एक आवाज़ में अपने नेता की मुक्ती चाहते थे। रायपुर जेल में एक गुप्त सुरंग बनाकर वीर नारायण सिंह को मुक्त कराया गया। जेल से बाहर निकलते ही उन्होंने हथियार उठाए और 500 सैनिकों की सेना तैयार की। 20 अगस्त 1857 को सोनाखान में स्वतंत्रता का रणघोष हुआ। वीर नारायण सिंह के नेतृत्व में गुरिल्ला युद्ध की रणनीति शुरू हुई और अंग्रेजी सेना टिक नहीं पा रही थी। स्मिथ के नेतृत्व में इलियट ने सैन्य टुकड़ियाँ भेजीं, लेकिन नारायण सिंह ने पलटवार की ऐसी रणनीति अपनाई कि अंग्रेजी दलों को पीछे हटना पड़ा। घनघोर जंगलों, पहाड़ियों और दुर्गम इलाकों से उन्होंने स्वतंत्रता के संघर्ष को जीवंत किया।

वीर नारायण सिंह के साथ हुई गद्दारी, गिरफ्तारी और अमरता

जब तक शरीर में शक्ति रही, वीर नारायण सिंह अंग्रेजों से लड़ते रहे। परंतु कुछ जमींदारों और साथियों के लालच के कारण विश्वासघात किया गया । यह इतिहास का सबसे गहरा घाव था। षड्यंत्र रचकर उन्हें फिर गिरफ्तार कराया गया और उन पर राजद्रोह व हत्या जैसे झूठे आरोप मढ़कर मुकदमा चलाया गया। जिसे जनता अपना राजा मानती थी उसी को राजद्रोही घोषित किया गया। ब्रिटिश शासन ने न्याय का सबसे क्रूर मजाक किया, लेकिन जनता के दिलों में उनका सम्मान और अग्निवृद्धि ही हुई।

10 दिसंबर 1857 की वह बलिदान जिसने इतिहास बदल दिया

10 दिसंबर 1857 को रायपुर के जयस्तंभ चौक पर उन्हें फाँसी देकर और शरीर को तोप से बाँधकर उड़ा दिया गया। अंग्रेजों को भ्रम था कि उनका शरीर नष्ट करके आंदोलन को समाप्त कर देंगे। लेकिन जिस क्षण उनका शरीर विस्फोट में विलीन हुआ, उसी क्षण वे अमर हो गए। उनका बलिदान केवल मृत्यु नहीं था बल्कि वह प्रेरणा बन गया। उनकी मृत्यु के बाद स्वतंत्रता संग्राम और तीव्र हुआ और अनेक क्रांतिकारी वीर नारायण सिंह के साहस से प्रेरित होकर फिर संघर्ष में उतरे। रायपुर का जयस्तंभ चौक केवल एक फाँसी का स्थल नहीं है बल्कि छत्तीसगढ़ के स्वाभिमान, साहस और शौर्य का प्रतीक बन गया है।

वीर नारायण सिंह का नाम केवल इतिहास नहीं बल्कि समाज की जन चेतना ऊर्जा है

आज छत्तीसगढ़ के नवा रायपुर में शहीद वीर नारायण सिंह अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम के साथ – साथ शहीद वीर नारायण सिंह कमर्शियल कॉम्प्लेक्स घड़ी चौक रायपुर, शासकीय शहीद वीर नारायण सिंह महाविद्यालय, शहीद वीर नारायण सिंह एचएस विद्यालय भिलाई, शहीद वीर नारायण सिंह स्मारक (राजभवन के निकट) जिसका उद्घाटन पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह द्वारा 1984 में किया गया था, इसके साथ ही भारत सरकार द्वारा 1987 में जारी डाक टिकट उनका राष्ट्रीय सम्मान के रूप में षामिल है। आज बिंझवार कोयतुर समुदाय सहित सभी जनजातीय समाज के लोग छत्तीसगढ़ में हर वर्ष 10 दिसंबर को बलिदान दिवस मनाकर इस वीर सपूत को नमन करते हैं। यही विरासत आज भी संस्कृति के उत्सव के रूप में जीवंत है और प्रत्येक वर्ष बलौदाबाजार के राजा राव पठार में शहीद वीर नारायण सिंह के नाम से भव्य “वीर मेला” आयोजित होता है जिसमें प्रदेश के कोयतुर समुदाय के साथ समस्त जनजातीय समाज के लाखों लोग सम्मिलित होकर अपने महानायक को श्रद्धांजलि अर्पित करते है ।

युवाओं के लिए संदेशः वीरता का अर्थ युद्ध नहीं, अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना है

आज जब हम आधुनिक भारत की प्रगति, शिक्षा, तकनीक और परिवर्तन की बात करते हैं तब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या हम अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस रखते हैं? वीर नारायण सिंह ने लोगों को सिखाया कि राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमाओं से नहीं बल्कि नागरिकों के नैतिक साहस से बनता है। नेतृत्व सत्ता से नहीं सेवा से जन्मता है। देशभक्ति शब्द नहीं संघर्ष है। बलिदान मृत्यु नहीं अमरत्व का द्वार है। उनकी प्रेरणा हर पीढ़ी को यही कहती है कि यदि अन्याय है तो संघर्ष ही धर्म है। अंग्रेजों ने सोचा था कि शरीर को तोप से उड़ाकर वे अस्तित्व मिटा देंगे परंतु उन्होंने इतिहास लिख दिया। शहीद मृत्यु नहीं प्रेरणा में बदल गए। आज रायपुर का जयस्तंभ चौक केवल एक चौक नहीं बल्कि यह छत्तीसगढ़ की अस्मिता और गौरव का स्मारक है। सोनाखान की मिट्टी का हर कण यही घोषणा करता है कि जब तक अन्याय रहेगा तब तक वीर नारायण सिंह जैसे सपूत जन्म लेते रहेंगे। वे केवल प्रथम स्वतंत्रता सेनानी नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ की आत्मा, आत्मसम्मान और इस धरती की अनंत शौर्य परंपरा के प्रथम दीपस्तंभ हैं।

लेखक/विचारक : महेन्द्र सिंह मरपच्ची

 प्रदेश मीडिया प्रभारी (कोया पूनेम् गोंडवाना महासभा & गोंडवाना फिल्म प्रोडक्शन सरगुजा)

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