धर्मपाल कोड़ापे ने कहा कि आज मैं आप सभी के समक्ष उन बातों से पर्दा हटाने का प्रयास करना चाहता हूँ जिन्हें पिछले 3-4 सालों से तमाशा बनाकर रखा गया है और जिस तरह कुछ लोग आपको नचा रहे हैं आप सब बिना समझे उसी ताल पर नाच रहे हैं जो भी अपना “गेम प्लान” बना रहा था वह कई सालों से आपके दिमाग से खेल रहा था और यह देख रहा था कि कितने लोग अंधभक्त बनते जा रहे हैं जब उन्हें लगा कि अंधभक्तों की संख्या पर्याप्त हो गई है तब उन्होंने सबसे बड़े त्यौहार देवारी को निशाना बनाया देवारी जो लगभग पाँच दिनों तक मनाया जाता है उसकी खासियत यह है कि इस समय किसान का धान पककर तैयार हो जाता है यानी पूरे साल की मेहनत का फल उसके घर आ चुका होता है और बाजार भी गर्म रहता है लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है कि जब किसान खेती की शुरुआत करता है बुआई निंदाई और मिंजाई तक तब तक उसकी जमा पूंजी लगभग समाप्त हो जाती है इसलिए ही गाँव में एक कहावत प्रचलित है “देवारी हरे अमीर के होरी हरे गरीब के” अर्थात् दीवाली अमीरों की होती है और होली गरीबों की क्योंकि किसान के पास इस समय धन खत्म हो चुका होता है फिर भी त्यौहार मनाने के लिए उसे रुपयों की जरूरत पड़ती है इस वर्ष उदाहरण लें देवारी 18 अक्टूबर से शुरू होकर 23 अक्टूबर तक मनाई जाएगी वहीं सरकार ने धान खरीदी 15 नवम्बर से शुरू करने की घोषणा की है अब सोचिए किसान को त्यौहार भी मनाना है और आर्थिक संकट से भी गुजरना है ऐसे में वह मजबूर होकर सेठ-साहूकारों को अपना धान सस्ते दाम यानी लगभग ₹2000 प्रति क्विंटल में बेच देगा जबकि सरकार द्वारा तय मूल्य ₹3100 है इस प्रकार सेठ-साहूकारों को प्रति क्विंटल ₹1100 का शुद्ध लाभ होगा दूसरी तरफ किसान त्यौहार के सामान खरीदने के लिए बनियों के पास दौड़ेगा ऐसे में दो-दो दिन का त्यौहार रखकर वे भीड़ को नियंत्रित करने और अधिक कमाई करने का अवसर पाते हैं यहाँ तक कि विभिन्न पूजा-पाठ करवाने वाले भी अलग-अलग जगहों पर जाकर पूजा करके अधिक भेंट या धन प्राप्त कर सकें इसलिए कई जगह दो-दो दिन का त्यौहार मनाया जाने लगा है मेरे वर्षों के अध्ययन और अनुभव के आधार पर मैंने यह निष्कर्ष निकाला है कि यह सब दो वर्गों की मिलीभगत से रचा गया एक सुनियोजित खेल है क्योंकि अगर आप गौर करें तो हरेली पोरा जैसे हमारे आंचलिक और कृषि-प्रधान त्यौहारों पर किसी का ध्यान नहीं जाता क्योंकि उनमें कमाई की गुंजाइश कम है इसलिए अब तक उन्हें छेड़ा नहीं गया है मुझे पूरा विश्वास है कि मेरा यह लेख बहुतों को सोचने पर मजबूर करेगा लेकिन सवाल यह है क्या आप समझ पा रहे हैं क्या आपके मन में यह बात उतर रही है चंद्रमा की पूर्णिमा और अमावस्या के पखवाड़ों के आधार पर महीनों का बढ़ना-घटना तो सदियों से होता आ रहा है परंतु इसमें शुभ-अशुभ का कोई वास्तविक प्रभाव नहीं होता फिर भी आप लोग उसी शुभ-अशुभ के जाल में फँसकर अपने मूल त्यौहारों के कारण और गाँव के आराध्य देवों से दूर हो रहे हैं याद रखिए जब आपके गाँव की व्यवस्था बिगड़ जाएगी तब कोई अचांग-पंचांग उसे नहीं बचा पाएगा अतः मेरा निवेदन है ऐसे कैलेंडर जिन्होंने हमारे तीज-त्यौहारों का मज़ाक बना दिया है उनका बहिष्कार करें अपने स्तर पर चाहे सामाजिक आंचलिक या ग्राम्य स्तर पर स्वयं के कैलेंडर तैयार करवाएँ इसमें अधिक खर्च नहीं आता और मेरी बातों का प्रमाण ढूँढने के लिए आप ऋषि पंचांग का भी अध्ययन कर सकते हैं ।
त्यौहारों के नाम पर चाल जब अंधभक्ति बन गई बाजार की रणनीति
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