एमसीबी! छत्तीसगढ़ की धरती सदियों से जनजातीय परंपराओं की वह पवित्र भूमि रही है जिसने भारत की आत्मा को जीवंत बनाए रखा है। यही वह भूमि है, जहाँ जंगलों की हरियाली, नदियों की स्वच्छता और जनजातीय संस्कृति की गहराई एक-दूसरे में घुल-मिलकर एक संतुलित जीवन दर्शन का निर्माण करती हैं। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार ने इन्हीं परंपराओं को नई ऊर्जा देने के लिए जो ऐतिहासिक पहल की है, उसका नाम है धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान (DA-JGUA)। यह अभियान आदिवासी अस्मिता, स्वाभिमान और सशक्तिकरण का मॉडल बन चुका है। “धरती आबा” नाम से स्वयं भगवान बिरसा मुंडा क्रांतिकारी व्यक्तित्व की स्मृति है, जिन्होंने आदिवासी अस्मिता और अधिकारों की लड़ाई में अपना इतिहास रचा और भगवान बिरसा मुंडा के नाम से जाना गया। उन्होंने जल, जंगल और जमीन की रक्षा को अपना जीवन का हिस्सा बना लिया था। आज वही विचार, वही आत्मा, वही संघर्षशीलता इस अभियान की नींव और प्रेरणा है।

मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर में वनाधिकार से ग्रामोदय तक की प्रेरक कहानी
मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिला छत्तीसगढ़ के उत्तर में बसा एक ऐसा क्षेत्र है, जो प्रकृति की गोद में बसा हुआ है। यहाँ की मिट्टी में जनजातीय परंपराओं की खुशबू है और यहाँ के लोगों में आत्मसम्मान की शक्ति बसा हुआ है। यह जिला जनजातीय विकास की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील और प्रेरणास्पद माना जाता है। इसी जिले से धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान ने अपनी ठोस नींव रखी। जिले के तीनों प्रमुख विकासखण्ड मनेंद्रगढ़, भरतपुर और खड़गवा अब जनसशक्तिकरण की मिसाल बन चुके हैं। इस अभियान के अंतर्गत जिले के 151 ग्रामों का चयन किया गया है, जिनमें से 145 ग्राम को वन अधिकार अधिनियम 2006 के अंतर्गत शामिल किया गया है। यह उस ऐतिहासिक परिवर्तन की कहानी है जिसमें “अधिकार” और “विकास” का वास्तविक समन्वय पहली बार धरातल पर साकार हुआ है।
मनेंद्रगढ़ ब्लॉक में शिक्षा, आजीविका और चेतना का संगम
मनेंद्रगढ़ ब्लॉक में कुल 54 ग्राम इस अभियान का हिस्सा हैं। यहाँ की ग्राम पंचायत जैसे तिलोखन, बहेराटोला, घाघरा, चरवाही, डाडहंसवाही, केवटी, डुगला, डिहुली, बिरौरीडांड, रोझी, पहाड़हंसवाही, कछौड़, बड़काबहरा, हर्रा, रोकड़ा, लोहारी, मुसरा, बाही, ताराबहरा और शिवगढ़ जैसे अनेकों ग्राम पंचायत जनजागरण का केंद्र बन चुका हैं। इन ग्राम के ग्राम सभाओं में गठित वन अधिकार समितियाँ न केवल अपने ग्राम के प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा कर रही हैं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और स्वच्छता जैसे क्षेत्रों में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। महिलाओं की भागीदारी यहाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिसमें स्व-सहायता समूह अब ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुके हैं। वनोपज आधारित उत्पादों जैसे महुआ, तेंदूपत्ता, साल बीज, हरी सब्जियाँ और औषधीय पौधों के माध्यम से आत्मनिर्भरता का मॉडल तैयार हो रहा है। यह ब्लॉक “ग्रामोदय से जनोदय” के उस आदर्श को साकार कर रहा है।
भरतपुर ब्लॉक प्राकृतिक संपदा से आत्मनिर्भरता की दिशा में
भरतपुर ब्लॉक में कुल 55 ग्राम पंचायत “DA-JGUA” से जुड़े हुए हैं। जिसमें बडवाही, मेहदौली, उदकी, हरचौका, बेलगांव, चरखर, पूंजी, चिड़ौला, देवगढ़, सिंगरौली, लरकोडा, बड़काडोल, डोगरीटोला, नौढ़िया, कुवांरी, पतवाही, चांटी, मलकडोल जैसे अनेकों ग्राम पंचायत शामिल हैं। यह ब्लॉक अपनी प्राकृतिक संपदा और घने वनों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के ग्रामों में वन अधिकार अधिनियम के अंतर्गत दी गई भूमि का उपयोग अब जैविक खेती, वनोपज उद्योगों और बांस आधारित लघु उद्यमों में किया जा रहा है। महिलाएँ “वन उत्पाद मूल्यवर्धन” के प्रशिक्षण ले रही हैं और बाजार तक पहुँच बनाकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो रही हैं। यहाँ के महिला स्व-सहायता समूहों ने आयुर्वेदिक साबुन, हर्बल तेल, और जड़ी-बूटी आधारित उत्पादों का निर्माण प्रारंभ किया है, जो अब स्थानीय हाट-बाज़ारों से लेकर डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म तक पहुँच रहे हैं। यह सशक्तिकरण की वह दिशा है जहाँ जंगल अब सिर्फ संसाधन नहीं, बल्कि रोज़गार का विद्यालय बन गया है।
खड़गवां ब्लॉक परंपरा और प्रगति का अद्भुत संगम
खड़गवां ब्लॉक में 42 ग्राम पंचायतों इस अभियान का हिस्सा हैं। जिसमें बड़गांवकला, धवलपुर, कोडा, पैनारी, मेण्ड्रा, बेलबहरा, जरौधा, सकड़ा, कटकोना, शिवपुर, लकड़ापारा, बरदर, गिद्धमुड़ी, उधनापुर, आमाडाड़, मझौली, ठगगांव, रतनपुर, बोडेमुड़ा, धनपुर, दुग्गी और सिघत जैसे अनेकों ग्राम पंचायतों में आज ग्राम उत्कर्ष समितियों के सहयोग से आत्मनिर्भरता की राह पर हैं। यहाँ के ग्रामों में कृषि विविधीकरण, औषधीय पौधों की खेती, फलदार वृक्षारोपण और सामुदायिक जल प्रबंधन जैसे नवाचार अपनाए जा रहे हैं। युवाओं को वन अधिकार आधारित आजीविका प्रशिक्षण दिया जा रहा है ताकि वे परंपरागत ज्ञान और आधुनिक तकनीक का संतुलन बना सकें। ग्राम समाज में “सामूहिक निर्णय प्रणाली” की परंपरा को पुनर्जीवित किया गया है, जिससे हर निर्णय में ग्रामीणों की भागीदारी सुनिश्चित होती है।
वन अधिकार अधिनियम अधिकार नहीं, सामाजिक न्याय की पूंजी है
मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले में कुल 365 ग्राम ऐसे हैं जिन्हें वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत अधिकार प्राप्त हुआ है। यह अधिकार केवल भूमि पर स्वामित्व का प्रमाण पत्र नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय और आत्मसम्मान की पुनर्स्थापना का प्रतीक है। जब किसी जनजातीय परिवार को अपनी जमीन का अधिकार मिलता है, तो वह केवल आर्थिक रूप से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आत्मिक रूप से भी सशक्त होता है। इस अभियान ने इन गांवों को योजनाओं के केंद्र में लाकर शासन की सोच को धरातल पर उतारा है। इन गांवों में सोलर ऊर्जा, स्वच्छ पेयजल, स्कूल भवनों का उन्नयन, पोषण आहार केंद्र और स्वास्थ्य शिविर और धरती आबा अभियान ने यह सिद्ध किया है कि जब विकास अधिकार से जुड़ता है, तब वह स्थायी बन जाता है।
धरती आबा की आत्मा से सशक्त हो रहा ग्राम भारत
धरती आबा बिरसा मुंडा ने कहा था की “हमारा जंगल, हमारी जमीन, हमारा हक़” यही विचार इस अभियान की आत्मा है। एमसीबी जिले में वन अधिकार अधिनियम और धरती आबा अभियान एक-दूसरे के पूरक बनकर उभरे हैं। अधिकार के साथ जब विकास जुड़ता है, तो समाज में आत्मविश्वास पनपता है। आज जिले के कई गाँवों में यह परिवर्तन दिखाई देता है की भरतपुर के दूरस्थ इलाकों में महिलाएँ वनोपज से बने उत्पाद बेचकर आर्थिक रूप से सशक्त हो रही हैं, तो खड़गवां के युवाओं को पारंपरिक हस्तशिल्प व जंगल आधारित आजीविका में प्रशिक्षित किया जा रहा है। मनेंद्रगढ़ के विद्यालयों में स्थानीय भाषा और संस्कृति पर आधारित शिक्षा मॉडल लागू किए गए हैं। धरती आबा अभियान का सबसे बड़ा योगदान यह है कि इसने भागीदारी आधारित शासन की अवधारणा को सशक्त किया है। प्रत्येक ग्राम पंचायत में गठित ग्राम उत्कर्ष समिति यह सुनिश्चित करती है कि योजनाओं का क्रियान्वयन जनता की सक्रिय भागीदारी से हो। शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, कृषि और पर्यावरण जैसे क्षेत्रों में ये समितियाँ निगरानी और मार्गदर्शन का कार्य करती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” के मंत्र ने इस अभियान को राष्ट्रीय सोच से जोड़ा है।
धरती आबा के सपनों से सजता नया छत्तीसगढ़
धरती आबा बिरसा मुंडा का सपना था कि एक ऐसा समाज हो जहाँ आदिवासी अपने अधिकारों के साथ सम्मानपूर्वक जी सके, अपने जंगलों की रक्षा करे और आत्मनिर्भर बने। आज छत्तीसगढ़ में “धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान” उस सपने को साकार कर रहा है। एमसीबी जिले के 151 ग्रामों की यह यात्रा परंपरा और आधुनिकता का संगम है। 145 ग्रामों का वन अधिकार अधिनियम से जुड़ना यह दर्शाता है कि शासन अब केवल विकास नहीं, बल्कि अधिकार आधारित विकास की दिशा में अग्रसर है।

